नयी दिल्ली: सरकार और भारतीय रिजर्व बंैक की तमाम कोशिशों के बावजूद बढ़ती महंगाई से घरेलू मांग प्रभावित होने और वैश्विक आर्थिक संकट की मार से इस वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित रही हालांकि वित्त मंत्री पी चिदंबरम के प्रयासों तथा अंतिम छमाही में कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन और निर्यात में सुधार होने से अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने के संकेत मिले हैं। वर्ष 2011 में यूरोपीय देशों के दोबारा मंदी के चपेट में आने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा था जिससे वर्ष 2012 में देश के निर्यात और घरेलू मांग दोनों प्रभावित हुये। वर्ष 2013 में भी भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक के साथ ही घरेलू कारकों से प्रभावित रही और इसका असर निवेश निर्यात और घरेलू मांग सहित लगभग सभी क्षेत्रों पर दिखा। सरकार और रिजर्व बंैक ने महंगाई को नियंत्रित करने और विकास को पटरी पर लाने का भरपूर प्रयास किया लेकिन पूरे वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था पांच प्रतिशत की विकास दर के स्तर को पार नहीं कर पायी। वर्ष 2013 की पहली तिमाही में जहां विकास दर 4.8 प्रतिशत रही वहीं दूसरी तिमाही में यह गिरकर 4.4 प्रतिशत पर पहुंच गयी। हांलाकि इसके बाद बेहतर मानसून और औद्योगिक गतिविधियों में सुधार होने से तीसरी तिमाही में यह फिर से 4.8 प्रतिशत पर पहुंचने मे सफल रही। सरकार ने बजट में चालू वित्त वर्ष में विकास दर 6.7 प्रतिशत तक रहने का अनुमान जताया था लेकिन अप्रैल जून तिमाही में विकास दर के 4.4 प्रतिशत पर आने के बाद बजट अनुमान को संशोधित किया गया और इसके 5.7 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया जाने लगा। हांलाकि वैश्विक स्तर की साख निर्धारण एजेसियों विश्व बैक और अंतरराष्टÑीय मुद्रा कोष ने भारत के पांच प्रतिशत से भी कम की दर से बढ़ने का अनुमान जताया। इसके बाद सरकार ने चालू वित्त वर्ष में विकास दर पांच प्रतिशत या उससे ऊपर रहने की बात कही है। हालांकि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में यह करीब 4.7 प्रतिशत रही लेकिन अब तीसरी तिमाही में इसके पांच प्रतिशत से अधिक होने की उम्मीद जतायी जा रही है। पूरे वर्ष महंगाई से जनता पूरी तरह बेहाल रही। इसको नियंत्रित करने के रिजर्व बैंक के सभी मौद्रिक उपाय लगभग असफल साबित हुये। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपने कार्यकाल में महंगाई को नियंत्रित करने को प्राथमिकता दी उसी तरह से नये गवर्नर रघुराम राजन की प्राथमिकताओं में भी महंगाई प्रमुख है। कार्यभार संभालने के बाद से बढ़ती महंगाई का हवाला देते हुये अब तक वह दो बार अल्पकालिक ऋण दरों में बढ़ोतरी कर चुके है और अब किसी भी समय इसमें बढ़ोतरी किये जाने के संकेत दिये है। अमेरिका में फेडरल रिजर्व के इस वर्ष मई के तीसरे सप्ताह में 85 अरब डालर के मासिक आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज को वापस लेने की खबर आने से भारत के साथ ही पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर से चरमराने लगी। इस वजह से पूरी दुनिया की मुद्राओं का भी अवमूल्यन हुआ और रूपया अब तक के रिकार्ड स्तर 66 रूपये प्रति डालर के स्तर पर पहुंच गया। रूपये में अवमूल्यन से चिंतित सरकार ने चालू खाता घाटा और व्यापार घाटा को नियंत्रित करने के लिए कई उपाय किये। साथ ही रिजर्व बंैक ने रूपये में जारी गिरावट का थामने की दिशा में भी कई उपाय किये जिससे भारतीय मुद्रा को कुछ बल मिला लेकिन अब भी यह 62 रूपये प्रति डालर के आसपास बना हुआ है। देश में निवेश बढ़ाने के लिए सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश( एफडीआई) की नीति को और लचीला बनाया है। कई क्षेत्रों में एफडीआई की सीमा बढ़ायी गयी है और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस कमोडिटी एक्सचेंज पावर एक्सचेज शेयर बाजार डिपोजिटरी एवं क्लियरिंग कंपनियों संपदा पुननिर्माण कंपनियों क्रेडिट इर्फोंमेशन कंपनियों एकल ब्रांड खुदरा कारोबार कुरियर सेवाओं में इसे और उदार बनाया गया है। रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय मंजूरी के बाद शत प्रतिशत एफडीआई की मंजूरी दी गयी है। दूरसंचार क्षेत्र में भी इसे बढ़ाकर शत प्रतिशत कर दिया गया है।

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