संवाददाता पटना
राज्य में पटना की विभिन्न अदालतों से दो बहुचर्चित मामले में फैसले समेत चार लोगों को फांसी और 144 लोगों को उम्रकैद की सजा के लिए जहां वर्ष 2013 को जाना जायेगा, वहीं पूर्व में एक दोषी को दी गयी फांसी की सजा को उसी अदालत से उम्रकैद में बदले जाने का निर्णय भी नजीर बना। पिछले वर्ष त्वरित विचारण के मामलों में राजधानी पटना के ही दो बहुचर्चित मामलों में फैसला आया। पहला मामला जहां राजधानी के बहुचर्चित ट्रांसपोर्टर एवं जदयू नेता सत्येन्द्र सिंह की हत्या का था तो दूसरा मामला राजधानी के ही एक व्यवसायी के दो अबोध बच्चों और उसकी पत्नी समेत तीन लोगों की उनके ही नौकरों द्वारा लूट को अंजाम देने के दौरान पहचान छिपाने के लिए की गयी निर्मम हत्या का था। ट्रांंसपोर्टर सत्येन्द्र सिंह की हत्या वर्ष 2009 में हुई थी। इस मामले में सत्येन्द्र के एक करीबी और साझेदार पूर्व सांसद विजय कृष्ण उनके पुत्र चाणक्य उर्फ गुड्ड , घरेलू नौकर गगन कुमार और पूर्व सांसद के अंगरक्षक उमेश सिंह आरोपी बनाये गये थे। मामला चर्चित इसलिए हुआ क्योंकि सत्येन्द्र सिंह की हत्या करने के बाद उसके शव को एक बड़े बक्से में बंद कर महात्मा गांधी सेतु से गंगा नदी में फेंक दिया गया था। अपहरण का मामला दर्ज होने के बाद जब नौकर गगन की गिरफ्तारी हुई तब इस पूरे मामले का खुलासा हुआ। सत्येन्द्र सिंह के शव को भी बरामद करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी और यहां तक की नौसेना की मदद भी लेनी पड़ी। तब कही जाकर 23 मई 2009 को हुई हत्या के करीब बीस दिन बाद 11 जून 2009 को पटना सिटी स्थित गंगा नदी के दुल्ली घाट के निकट से सत्येन्द्र सिंह का शव बरामद किया गया था। मामले में सुनवाई त्वरित विचारण (स्पीडी ट्रायल) के तहत की गयी और दोनों पक्षों की गवाहियां और बहस पूरी होने के बाद 19 नवम्बर 2013 को पटना सदर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश नंद कुमार श्रीवास्तव ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। एक और महत्वपूर्ण फैसला पांच दिसम्बर 2013 को आया, जब पटना सदर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिल कुमार सिंह ने पटना उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में सजा के बिंदु पर सुनवाई करने के बाद बिहार के चर्चित बाथे नरसंहार के एक दोषी धर्मा सिंह की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। वर्ष 1997 में बिहार के तत्कालीन जहानाबाद जिले के लक्ष्मणपुर बाथे गांव मे बच्चों और महिलाओं समेत 58 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी गयी थी। इस मामले में सात अप्रैल 2010 को पटना की ही एक सत्र अदालत ने धर्मा सिंह समेत 16 अभियुक्तों को दोषी करार देने के बाद फांसी और दस दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनायी थी। जिस दिन सजा के विंदु पर सुनवाई होनी थी और सजा सुनायी गयी थी उसी दिन से धर्मा सिंह फरार हो गया था। धर्मा सिंह को उसकी अनुपस्थिति में ही सजा सुनाने के बाद गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया था। बाद में जहानाबाद जिले में अन्य मामलों में उसे गिरफ्तार किया गया और बाद मे पटना स्थित इस मामले में भी पेश किया गया था। पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले के सभी सजायाफ्ता दोषियों को बरी कर दिया था, लेकिन धर्मा सिंह के फरार रहने की वजह से इसकी सजा पर यह टिप्पणी की थी कि सजा की बिंदु पर बिना सुनवाई किये सजा देना विधि सम्मत नहीं है । इसी आदेश के आलोक में अदालत ने धर्मा सिंह को सजा के सुनवाई के विंदु पर बहस करने का मौका दिया और उसके फांसी के सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदल दी गयी। मामले का एक अन्य पहलू यह भी है कि पटना उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ बिहार सरकार ने उच्चतम न्यायालय मे अपील दायर की है। इस वर्ष ही पटना न्याय मंडल स्थित बाढ़ अनुमंडल की एक सत्र अदालत ने तीन लोगों की गोली मार कर की गयी हत्या के मामले म्ंो दों लोगो को फांसी की सजा सुनायी। साल के अंतिम कार्य दिवस पर 23 दिसम्बर 2013 को पटना न्याय मंडल की ही पटना सिटी स्थित एक सत्र अदालत ने फिरौती के लिए किये गये अपहरण और हत्या के मामले मे नौ लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। वहीं हत्या के प्रयास के मामले मे पटना की एक त्वरित अदालत द्वारा दिया गया एक फैसला भी चर्चा में रहा जब न्यायालय ने इस मामले के 15 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनायी।

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