बुनकर ने पहली बार कमाए चालीस हजार, एक साथ पैसे देखकर कांपने लगे हाथ…

नई दिल्ली। ‘मैने बहुत गरीबी देखी है। लगातार काम करता था तो सप्ताह मे डेढ़ साड़ी बुन पाता था, जिसका सेठ 700 से 800 रुपये मेहनताना देता था। कभी 20 हजार रुपए एक साथ नहीं देखे थे। जब पहली बार अपनी कमाई के 40000 रुपये एक साथ देखे तो हाथ कांपने लगे। एक जोड़े ने 9 साल की लड़की के रूप में 22 साल की महिला को गोद लिया

ये दास्तां हैं नोएडा सेक्टर 62 के एक्सपो सेंटर में चल रहे आदि महोत्सव में मध्य प्रदेश चंदेरी से आए बुनकर घनश्याम की। जो कि बात करते करते अपनी गरीबी के दिन याद करके भावुक हो जाते हैं। लेकिन आज घनश्याम अपनी पांच लाख की पूंजी जोड़ चुके हैं और बिना कहीं से कर्ज लिए ट्राइफेड की मदद से अपना खुद का कारोबार चला रहे हैं। चंदेरी काटन सिल्क की एक से एक खूबसूरत साड़ियां बुनने वाले घनश्याम हर साड़ी के साथ दाम के कम ज्यादा होने का कारण बताते चलते हैं। वे कहते हैं कि कभी भगवान को नहीं देखा, लेकिन मेरे लिए ट्राइफेड ही भगवान है। मेरी मिट्टी की कच्ची झोपड़ी थी जिसमें छप्पर नहीं डाल पाता था, क्योंकि अगर उसमें लग गया तो पैसा कहां से आता बच्चे क्या खाते। जाड़े और बरसात मे पूरा परिवार एक चादर में सिकुड़ कर रात गुजारता था। आज हमारी स्थिति बदल चुकी है।

ट्राइफेड (ट्राइबल कोपरेटिव मार्केटिंग डेवलेपमेंट फेडरेशन आफ इंडिया) भारत सरकार के जनजातीय मंत्रालय के तहत आने वाला सरकारी उपक्रम है जो कि आदिवासियों के उत्थान और उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने के लिए उनके उत्पादनों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग करके उसे देश विदेश के बाजार तक पहुंचाता है। इसी क्रम में अलग अलग राज्यों में आदि महोत्सव आयोजित किये जाते हैं जिनमें आदिवासी अपने उत्पाद और कारीगरी लेकर शामिल होते हैं। नोएडा मे शनिवार को शुरू हुए आदि महोत्सव का उद्घाटन जनजातीय मामलों की राज्य मंत्री रेणुका सिंह ने किया। महोत्सव में करीब 20 राज्यों के आदिवासी कारीगरों ने भाग लिया है।

इन्हीं में से एक हैं मध्यप्रदेश चंदेरी के बुनकर घनश्याम जिन्हें ट्राइफेड से जुड़े सिर्फ डेढ़ साल हुआ है। एक दिन उसके पास ट्राइफेड के शेखावत पहुंचे उनका पूरा नाम वह नहीं जानता लेकिन उन्होंने ही उसे 11 लोगों के समूह में शामिल किया जो साडि़यां और कपड़ा बुनते थे और डेढ़ साल में उसकी किस्तम बदल गई। इस वर्ष उसे ट्राइफेड से 20 लाख का सौदा मिला है जिसमें से 7-8 लाख का काम वह कर चुका है।

एप्लीक, पैच, और राजस्थानी कढ़ाई में पारंगत 50 साल की लहरा देवी की कहानी भी अलग है। बाड़मेर की लहरा की तीन बेटियां हैं। बेटा नहीं था इसलिए 30 साल पहले पति की दूसरी शादी करा दी और स्वयं दांपत्य जीवन छोड़ भक्ति और काम में रम गईं। लहरा के मुताबिक वे भील समाज से हैं और हमारे समाज में बेटा नहीं होता तो लोग बहुत बातें करते हैं। लहरा को चश्मा लग गया है इसलिए वह अब कारीगरी का महीन काम नहीं कर पाती लेकिन ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान से जुड़ी लहरा आफिस में बैठती हैं और कारीगरों का काम देखती हैं। पांचवीं तक पढ़ी लहरा सिर्फ हिन्दी पढ़ना जानती हैं। कामकाज ने उन्हें तकनीकी ज्ञान सिखा दिया है। वह बोलकर अपने मोबाइल में हिन्दी में नंबर सेव करती हैं और तत्काल ग्राहक का नंबर लेकर उसे समूह के काम के बारे में वाट्सअप भी भेज देती हैं।

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