बिहार सरकार के नए निर्णय ने उड़ाए सभी के होश।कभी टॉपर्स घोटाला और कभी छात्रों के खराब रिजल्ट होने के कारण हो रही फ़ज़ीहत से बचने को सुधार का अनोखा उपाय खोजा है बिहार सरकार ने। 50 वर्ष से अधिक उम्र के शिक्षकों को दोषी मां इन पर ही कार्रवाई का लिया सरकार ने फैसला।

पिछले वर्ष बिहार सरकार का शिक्षा विभाग इण्टरमीडिएट टॉपर्स घोटाले के कारण चर्चा में रहा था।सबको लगा सरकार सीख लेगी और इस साल बिहार की शिक्षा व्यवस्था बेहतर हो जाएगी,रिजल्ट अच्छे आएंगे।मगर ये क्या इस वर्ष इंटर में 62% और मेट्रिक में 49% विद्यार्थी हो गए फेल।सो अब जब बीजेपी के साथ नीतीश कुमार ने बिहार में नई सरकार बनाई तो सबसे पहले शिक्षा विभाग की समीक्षा और निर्णय चौकाने वाले।बिहार में खराब रिजल्ट देने वाले 600 विद्यालय के शिक्षक सबसे पहले नपेंगे और वो भी 50 वर्ष पर वाले।आपको मज़ाक लगे मगर ये सच है 50 वर्ष से ऊपर वाले शिक्षकों की योग्यता जांची जाएगी और इन्हें vrs यानी अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जाएगी।

सुना आपने सरकार को लगता है की 50 वर्ष से ज्यादा वाले शिक्षक ही है दोषी सो इनके कारण हुआ है रिजल्ट खराब।नॉन परफॉर्मर उम्र देख कर तय हो,इतना ही नही अब तो सरकार ने स्कूल के शौचालय के सफाई की जिम्मेवारी बच्चों को दे दिया है।यानी पढाई के साथ शौचालय की करें सफाई।विद्यालय प्रशासन की जवाबदेही नही।
सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा विरोध तो सहयोगी बीजेपी के तरफ से हुआ है।एमएलसी नवल किशोर यादव ने शिक्षकों के लिए इस तरह के फैसले पर सरकार की ही बखिया उधेड़ी।विभागों की नाकामी से लेकर पुलिसवालों का भी बनाया मज़ाक।नवल किशोर खुद भी प्रोफेसर हैं।

आश्चर्य की जदयू के एमएलसी प्रोफेसर रणबीर नन्दन की दलील सुनिए,ये कह रहे की सरकार का फैसला इसलिए उचित क्योंकि 50 के बाद शिक्षक स्लो यानी धीमे हो जाते हैं।जवाब सात्तारुढ़ दल के उच्च सदन के प्रोफेसर सदस्य को समझ नही आया।
मगर परेशान तो शिक्षक हैं जिन्हें ये समझ नही आ रहा है की आखिर बलि का बकरा बिहार की सरकार उन्हें क्यों बना रही है।उनकी क्या भूल।वो कह रगे की सरकार खुद हमारा गैर शैक्षणिक कार्यों में ज्यादा करती है इस्तेमाल।आखिर शिक्षक पर ही कार्रवाई क्यों।
सो सरकार के इन नए फैसलों ने कई सवाल खड़े किए हैं,आखिर खराब रिजल्ट का ठीकरा सिर्फ आयु विशेष के शिक्षकों पर क्यों,बाकी शिक्षकों की योग्यता का कैसे होगा निर्धारण।

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