पटना: बिहार की राजधानी पटना जिले के दुल्हिन बाजार प्रखंड में एक स्कूल ऐसा भी है जो देखने में किसी खंडहर जैसा लगता है। प्रखंड के इस एकमात्र बालिका विद्यालय में 750 छात्राएं पढ़ती हैं, लेकिन उनके बैठने के लिए सिर्फ दो ही कमरे हैं।स्कूल की खपरैल की छत और मिट्टी की दीवारें कभी भी गिर सकती हैं। इसकी स्थापना के लिए 1980 में उलार राजपरिवार के नागेश्वरधारी सिंह ने अपनी 4 एकड़ भूमि दान में दी थी। इसके साथ ही 18 जनवरी 1982 को राज्य सरकार से विद्यालय को मंजूरी भी दिलवाई थी। दो कमरों वाले इस स्कूल का हाल इतना बुरा है कि डर के चलते आधे से ज्यादा छात्राएं स्कूल ही नहीं आती हैं।

 

छात्राओं के न आने से ज्यादातर समय यह स्कूल बंद ही रहता है। छात्राएं कहती हैं कि  उन्हें यहां आकर पढ़ने में बहुत डर लगता है। स्कूल आने के बाद यहां छात्राएं बैठती कहां हैं इसका जवाब किसी के पास नहीं है। प्रधानाचार्य ने इस सवाल के जवाब में कहा कि पूरी छात्राएं कभी नहीं आतीं और जो आती हैं उन्हें किसी तरह बिठाया जाता है। उन्होंने  कहा कि कई बार अधिकारी आए और देखकर चले गए पर कार्रवाई कभी नहीं हुई।
उनका कहना था कि अभिभावकों को बच्चियों की पढ़ाई से ज्यादा साइकिल और ड्रेस की राशि की चिंता रहती है, इसलिए वे दबाव डालकर लड़कियों का दाखिला इस जर्जर विद्यालय में कराते हैं। विद्यालय में कुल 7 टीचिंग और दो नॉन टीचिंग स्टाफ हैं। क्लास रूम के साथ-साथ उसमें बेंच डेस्क भी कचरे के ढेर बने हुए हैं। पालीगंज अनुमंडल के एसडीओ  ने कहा कि  उन्होंने अभी स्कूल का निरीक्षण नहीं किया है। वे जल्द ही स्कूल को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।
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