स्टेमसेल थेरेपी असाध्य ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर और अन्य न्यूरोलॉजिकल विकारों के उपचार की नई उम्मीद है

न्यूरोजेन ने 25 मार्च 2018 को पटना में असाध्य न्यूरोलॉजिकल विकारों से जूझ रहे मरीजों के लिए निःशुल्क शिविर का आयोजन किया है

पटना, 08 मार्च 2018 : ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर से पीडि़त बच्चों के लिए मुंबई के बाहरी छोर पर स्थित भारत का प्रथम और एकमात्र स्टेम सेल थेरेपी केंद्र ‘ न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट’ एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। न्यूरोजेन ने अब तक दुनिया भर के करीब 1000 से अधिक ऑटिस्टिक बच्चों के इलाज की पेशकश की है।

न्यूरोजेन बीएसआई की स्थापना सुरक्षित और प्रभावी तरीके से स्टेम सेल थेरेपी के जरिए असाध्य न्यूरोलॉजिकल विकारों से पीड़ित मरीजों की मदद के लिए, उनके लक्षण और शारीरिक विकलांगता से राहत प्रदान करने के लिए की गई है।  न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट न्यूरोलॉजिकल विकार मसलन, ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता, ब्रेन स्ट्रोक , मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी , स्पाइनल कॉर्ड इंजुरी , सिर में चोट, सेरेबेलर एटाक्सिया , डिमेंशिया , मोटर न्यूरॉन रोग, मल्टीपल स्केलेरॉसिस और न्यूरोसाइकिएट्रिक विकार के लिए स्टेम सेल थेरेपी और समग्र पुनर्वास प्रदान करता है। अब तक इस संस्थान ने 50 से अधिक देशों के 5000 मरीजों का सफलतापूर्वक उपचार किया है।

न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट 25 मार्च 2018 को पटना शहर में एक निःशुल्क कार्यशाला और ओपीडी परामर्श शिविर का आयोजन कर रहा हैं। न्यूरोजेन को एहसास है कि स्पाइनल कॉर्ड इंजुरी, मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी, ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी इत्यादि विकारों से पीडि़त मरीजों को सिर्फ परामर्श के उद्देश्य से मुंबई तक की यात्रा करना काफी तकलीफदेह होता है, इसलिए मरीजों की सुविधा के लिए इस शिविर का आयोजन किया जा रहा है। असाध्य न्यूरोलॉजिकल विकारों से पीडि़त मरीज इस निःशुल्क शिविर में परामर्श के लिए समय लेने के लिए मोना ( मोबाइल नंबर- 09920200400 ) या पुष्कला ( मोबाइल नंबर- 09821529653 ) से संपर्क कर सकते हैं।

 

एलटीएमजी अस्पताल और एलटीएम मेडिकल कॉलेज, सायन, मुंबई के प्रोफेसर एवं न्यूरोसर्जरी के प्रमुख और न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. आलोक शर्मा ने कहा, ” चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति के विकास पर एक नजर डालने से पता चलता है कि मुश्किल लाइलाज बीमारियों का समाधान अक्सर मल्टी-डिसिप्लीनरी अप्रोच से मिलता है। यह तभी होता है जब लाइलाज या उपचार के लिहाज से मुश्किल विकारों के मामलों में अलग-अलग विशेषताओं के लोग अपने ज्ञान, कौशल और संसाधनों का संयुक्त रूप से प्रयोग करते हैं।”

न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट की उप निदेशक और चिकित्सा सेवा प्रमुख डॉ. नंदिनी गोकुलचंद्रन ने कहा, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसार्डर (एएसडी) बचपन की आम न्यूरो साइकिएट्रिक बीमारियों में से एक है। संयुक्त राज्य अमेरिका में हर 68 में से एक बच्चे में यह समस्या पाई गई है, तो भारत में हर 250 में से एक बच्चा ऑटिज्म से पीड़ित है और जागरूकता एवं उम्दा निदान के चलते यह संख्या आंकड़ों के लिहाज से बढ़ रही है।”

यह जानकर झटका लगता है कि बच्चे का ऑटिज्म पीड़ित होना अधिकांश माता-पिता के लिए जीवन को बदलने वाला अनुभव होता है। ऑटिस्टिक लक्षणों वाले ऑटिज्मग्रस्त बच्चे की परवरिश अभिभावकों के लिए, खासकर माताओं के लिए एक निरंतर चुनौती की तरह होता है क्योंकि यह थकाऊ, लंबी और अकेले रोलर कोस्टर की सवारी करने जैसी प्रक्रिया है। ऑटिज्म बचपन का एक विकार है जो बोलने में दिक्कत, अतिसक्रियता, आक्रामक व्यवहार और सामाजिक संपर्क में कठिनाई के परिणाम प्रकट करता है। वर्तमान में भारत में तकरीबन एक करोड़ बच्चे इससे प्रभावित हैं, जिनका दवाओं के सहारे, लाक्षणिक राहत, विशेष शिक्षा, ऑक्युपेशनल स्पीच और बिहैवियरल थेरेपी के साथ इलाज किया जा रहा है। कुछ ऐसे विकार होते हैं जिनमें उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ मेडिकल और पुनर्वास उपचार के बाद भी आज तक मेडिकल साइंस अभिभावकों को मेडिकल और भौतिक लाक्षणिक मामले में संतोषजनक राहत देने या समाज के साथ एकीकृत होने का संबल प्रदान करने में पूर्णतरू सक्षम नहीं है। ऑटिज्म भी एक ऐसा ही विकार है।

आज हम पटना के 14 वर्षीय साहिल नवनीत की केस रिपोर्ट को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें  ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार का ज्ञात मामला है। 9 महीने की उम्र तक उसके सभी मोटर माइलस्टोन्स (प्रेरक पेशीतंत्र) सामान्य थे। संवाद क्षमता का विकास देर से हुआ। वह महज एकाध शब्द या शब्दांश का उच्चारण कर सकता था। साहिल का जन्म सीजेरियन से हुआ, लेकिन यह पूर्णकालिक प्रसव था और उसके जन्म के दौरान किसी तरह की जटिलता नहीं पाई गई थी। जब वह 9 महीने का था तब जोर से हंसने के दौरान  उसे कंपकंपी के साथ कुछ सेकेंड के लिए अचेत हो जाने का दौरा पड़ा। डेढ़ साल की उम्र तक उसे इस तरह के दौरे कई बार पड़े।

साहिल के पिता ने कहा, ” जोर से हंसने के दौरान साहिल को पड़नेवाले इस दौरे से हम सभी चिंतित थे और परिवार के सभी सदस्यों ने तय किया कि हम उसे किसी भी परिास्थिति में जोर से नहीं हंसाएंगे। हमने पटना और आसपास विभिन्न चिकित्सकों से परामर्श लिया, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। साढ़े तीन साल की उम्र में साहिल ने अचानक बिना किसी सहारे के अपने बूते चलना, दौड़ना शुरू कर दिया। हमें उसकी हालत में और सुधार की उम्मीद थी, लेकिन कोई महत्वपूर्ण विकास नजर नहीं आया।”

5 साल की उम्र में एम्स में एक न्यूरोलॉजिस्ट ने उसका मूल्यांकन किया और उसके ऑटिज्म से पीडि़त होने का पता चला। हालांकि इस दौरान एम्स में भी कोई उपयुक्त उपचार या मार्गदर्शन नहीं मिला, बल्कि अभिभावकों को साहिल के परिपक्व होने तक इंतजार करने को कहा गया।

साहिल के पिता श्री नवनीत ने कहा, ” साहिल में मुख्य रूप से नजर मिलाने से बचना, बेचैनी, बैठे रहने पर विचलित हो जाने, सामाजिक संपर्क से कटने, ध्यान और एकाग्रता में कमी, झुंझलाहट के लक्षण मौजूद थे, दृश्य अवधारणात्मकता और संज्ञान कौशल कमजोर था। हमें साहिल को देने के लिए सिर्फ एक सिरप दिया गया और ऑटिज्म क्या है और इसमें किस तरह की देखभाल जरूरी होती है, इस बारे में कुछ नहीं बताया गया। माता-पिता के रूप में हमें यह जानकर झटका लगा कि हमारा बच्चा सामान्य नहीं है। हम इस स्थिति को स्वीकार करने और उसके विकास के लिए नए सिरे से प्रयास करने में कुछ समय लगा। हमारे परिवार के सभी सदस्यों ने हमें पूरा सहयोग दिया, लेकिन आमतौर पर हमारे पड़ोसियों अथवा समाज में साहिल की इस स्थिति के प्रति प्रतिरोध देखने को मिला।”

वर्ष 2005 से वर्ष 2016 तक आयुर्वेदिक और होमियोपैथिक दवाओं के सहारे साहिल का उपचार किया गया, लेकिन उससे नाममात्र का लाभ पहुंचा। इससे शरीर को तेजी से उम्रदराज बनानेवाले हार्मोनल परिवर्तन के हल्के दुष्प्रभाव का भी खतरा था। बढ़ती उम्र के साथ साहिल की अतिसक्रियता बढ़ती गई। मार्च 2016 में श्री नवनीत को इंटरनेट के माध्यम से इलाज के एक नये रूप स्टेम सेल थैरेपी के बारे में पता चला। भारत के कई केंद्रों में पूछताछ के बाद वे विशेषज्ञ प्रतिक्रिया और न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट में अपनाए जानेवाले संपूर्ण सुरक्षित उपचार प्रोटोकाल से आश्वस्त हुए। इसके बाद अक्टूबर 2016 में वे स्टेम सेल थैरेपी उपचार के लिए न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट पहुंचे।

न्यूरोजेन में जांच करने पर अक्टूबर 2016 में उसकी मुख्य शिकायतों में यह पाया गया कि उसका ध्यान क्षमता और एकाग्रता प्रभावित हुई थी। वह आसानी से विचलित हो जाता था। वह केवल बुनियादी 2 स्टेप कमांड का अनुसरण कर सकता था। उसकी अनुभूति और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता प्रभावित थी। उसकी जागरूकता और निर्णय लेने की क्षमता उम्र के अनुरूप नहीं थी। उसकी अनुकरण क्षमता बेहद कमजोर थी। उसका खेल व्यवहार प्रभावित था। दूसरे बच्चों के साथ खेलना उसे पसंद नहीं था। उसमें अनायास हंसने की प्रवृत्ति पाई गई। अतिसक्रियता की उपस्थिति थी। उसकी बैठने की सहिष्णुता खराब थी। उसमें रूढि़वादी व्यवहार की उपस्थिति थी। दोलन, उंगलियों को झटकने और हाथ फड़फड़ाने के संदर्भ उसमें मोटर मैनरिज्म ( प्रेरक पेशियों की उदासीनता) के लक्षण मौजूद थे। उसकी संवाद क्षमता जरूरत आधारित थी। केवल एकाध शब्द या शब्दांश का उच्चारण करता था। जिद्दी व्यवहार की उपस्थिति थी। वह अपनी सभी दैनिक गतिविधियों (एडीएल) के लिए दूसरों पर निर्भर थी।

न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट में साहिल का एक स्वनिर्धारित पुनर्वास कार्यक्रम के साथ स्टेम सेल थेरेपी उपचार शुरू हुआ। पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य अनुभूति और समझ विकसित करना, अतिसंवेदनशीलता को कम करना और एकाग्रता, संवेदी एकीकरण, निर्देश पालन और मरीज की समग्र बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना था। उसे ऐसे एक्सरसाइज बताए गए जिससे उसकी समझ में सुधार लाने और उसके व्यवहार, संवेदी व प्रेरक पेशियों के संचालन ( मोटर- संबंधी) की दक्षता में मदद मिलेगी। अपने-अपने क्षेत्र के सबसे अनुभवी पेशेवरों के मार्गदर्शन में उसे व्यावसायिक चिकित्सा, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मनोवैज्ञानिक परामर्श का एक संयोजित कार्यक्रम प्रदान किया गया। इससे उसके समग्र कौशल, योग्यता के उत्थान में मदद मिली, जिसके परिणामस्वरूप समग्र विकास हुआ। इन अभयासों को ऐसे सुव्यवस्थित ढंग से कराया गया कि मरीज को बीच-बीच में पर्याप्त आराम मिलता रहे। कुल मिलाकर पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य उसके समग्र जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना था।

स्टेम सेल थैरेपी उपचार के बाद साहिल में देखे गए सुधारों में मुख्य है उसकी ध्यान क्षमता और एकाग्रता में सुधार होना। इसके साथ ही उसके ध्यान की अवधि बेहतर हुई है। वह कार्य के दौरान बैठता है और उसे पूरा करने के लिए उसे प्रेरित किया जाता है। आदेशों का पालन करने में सुधार आया है। वह कई आदेशों का सहजता से पालन कर सकता है। अनुभूति और समस्या को सुलझाने में सुधार हुआ है। वह रंग, जानवरों और फलों को पहचान सकता है। उसने समस्या का समाधान करने के कौशल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। जागरूकता और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार आया है। अब वह खतरे के प्रति सचेत रहता है। अनुकरण क्षमता में सुधार आया है। अब वह अनुकरण कर सकता है। उसके खेल-व्यवहार में सुधार आया है। वह अपने सहपाठियों के साथ संरचित खेलों में व्यस्त रहने लगा है और अन्य सामाजिक परिवेश के बच्चों के समूह के बीच होने पर वह दर्शक बने रहने में रुचि लेता है। अतिसक्रियता में कमी आई है। बैठने की सहिष्णुता में सुधार हुआ है। अब वह लंबे समय तक बैठ सकता है। उसके सामाजिक संपर्क में सुधार हुआ है। वह अपने परिवार के सदस्यों को पहचान सकता है। आखिर जब बात सामाजिक संबंधों की आती है तो परिचितता एक महत्वपूर्ण कारक होता है। उसके नेत्र संपर्क में सुधार हुआ है। वह इसे बनाए रखने की कोशिश करता है। रुढ़िवादी व्यवहार में सुधार हुआ है। उँगलियों की कुलबुलाहट  कम हो गई है। आक्रामक व्यवहार कम हो गया है। दूसरों को मारना, लोगों को धक्का देना कम हो गया है। भाषण में सुधार हुआ है। संचार आवश्यकता आधारित, लेकिन अधिक संगत है। सभी दैनिक गतिविधियों में सुधार हुआ है। वह स्वतंत्र है, लेकिन पर्यवेक्षण की आवश्यकता है। शौचालय प्रशिक्षण में सुधार हुआ है। इस मामले में अब वह स्वतंत्र है, लेकिन नित्य कर्म के उपरांत स्वच्छता निर्देश की आवश्यकता है। बेवजह हंसना कम हो गया है। अब वह दूसरों की भावनाओं को समझने की कोशिश करता है। अब वह अपने दर्द को व्यक्त कर सकता है।

साहिल ने डेढ़ वर्ष की अवधि में क्रमिक सुधार दिखाना जारी रखा है, जिसके चलते उसके माता-पिता ने जनवरी 2018 के दौरान दोबारा इलाज सत्र देने का निर्णय लिया।

न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट की उप निदेशक और मेडिकल सर्विसेज की हेड डॉ. नंदिनी गोकुलचंद्रन ने कहा, ”ऑटिज्म उच्च मानसिक कायोंर् में दोष का कारण बनता है और बच्चों को अतिसक्रिय, आक्रामक बनाता है और उनके सामाजिक संबंधों को प्रभावित करता है। बोलचाल, भाषा और संचार कौशल को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। ऐसे बच्चे सामान्य स्कूलों में नहीं जा पाते हैं और अपनी दैनिक गतिविधियों के लिए माता-पिता या देखभाल करनेवालों पर पूरी तरह निर्भर रहते हैं। बच्चे का ऑटिज्म से पीडि़त होना समग्र परिवार को भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रभावित करता है। यह सामान्यतः लड़कियों के मुकाबले लड़कों में अधिक पाया जाता है। हालांकि सामान्य तौर पर तीन वर्ष की उम्र में बच्चों में इसके लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह काफी बड़ी उम्र के बाद उभरता है। इस विकार की ईटियोलॉजी (सटीक कारण) और पैथोफिजिओलॉजी के बारे में बेहद अनभिज्ञता है, लेकिन अनुसंधानों ने इसके लिए जेनेटिक्स (आनुवांशिकता), चयापचय या न्यूरोलॉजिकल कारकों, कुछ विशेष प्रकार के संक्रमणों जन्म के पूर्व या प्रसवोत्तर पर्यावरण आदि की ओर इशारा किया है।’’

डॉ. आलोक शर्मा ने आगे कहा, ”स्टेम सेल थेरेपी ऑटिज्म के लिए उपचार के नए विकल्प के रूप में उभर रही है। इस उपचार में आणविक, संरचनात्मक और कार्यात्मक स्तर पर क्षतिग्रस्त तंत्रिका ऊतकों की मरम्मत की क्षमता है। ”

 

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