दिल्ली की राजनीति पिछले एक-डेढ़ दशक में कैसे बदली है, इसका अंदाजा दिल्ली नगर निगम चुनाव से लगाया जा सकता है. कभी पंजाबी, वैश्य, जाट और गुर्जर समाज के इर्द-गिर्द घुमने वाली दिल्ली की राजनीति 2015 के विधानसभा चुनाव से बदल गई है. केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने इसी प्रवासी वोट बैंक में सेंध लगाकर दिल्ली में परचम लहराया. जहाँ कांग्रेस के राज में कभी प्रवासी वोटों को महत्व नहीं दिया गया था.

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पारंपरिक रूप से पूर्वाचली मतदाता भाजपा और कांग्रेस को ही मतदान करते रहे हैं, लेकिन केजरीवाल के प्रयोग से दिल्ली की राजनीति बदल गई. दिल्ली के एमसीडी चुनाव में पूर्वाचल और बिहार की एक बड़ी आबादी को लुभाने के लिए छोटी से लेकर बड़ी पार्टियां गठजोड़ में जुट गई हैं. दिल्ली नगर निगम चुनाव में इस बार भारतीय जनता पार्टी , कांग्रेस और आप पूर्वाचल के मतदाताओं को लुभाने की होड़ मची हुई हैं.

इस बार नगर निगम में जहाँ भाजपा ने प्रवासी उम्मीदवारों की संख्या दोगुनी कर दी. वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने भी खूब टिकट दिए हैं. भाजपा ने पूर्वांचल से आने वाले मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष इसे ध्यान में रख कर ही बनाया और एमसीडी चुनाव से पहले भोजपुरी फिल्मों के एक और स्टार अभिनेता रवि किशन को पार्टी में शामिल कर भाजपा ने अपनी रणनीति और भी स्पष्ट कर दी है. आम आदमी पार्टी तो खैर प्रवासी वोट के सहारे चुनाव लड़ रही है, और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी वोट के सहारे निगम की 113 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं.

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एक अनुमान के मुताबिक, दिल्ली की करीब 1 करोड़ 90 लाख की आबादी में लगभग 30 से 40 लाख तक बिहारी और पूर्वांचल के मतदाताओं की संख्या है. जो किसी भी पार्टी की जीत और हार का फैसला करने का माद्दा रखते हैं. हर पार्टी पूर्वाचल के मतदाताओं के वोट साधने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है.

कांग्रेस भी पूर्वाचली गठजोड़ में पीछे नहीं है. पार्टी पूर्वाचली क्षेत्रों में प्रचार पर पूरा ध्यान दे रही है. पार्टी ने पूर्वाचली पैठ वाले नेताओं को प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी दे रखी है.

ऐसे में दिल्ली में रहने वाले बिहारी अपने किस नेता की ओर आकर्षित होते हैं या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

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