था बादलों से घिरा मेरा आकाश
और जीवन उन गहराईयों में
जहाँ कोई उम्मीद नहीं बची थी .
हो चुकी थी आत्मा
सूखी पत्तियों के रंध्रों जैसी

जानता था , अब फिर से हरियाली नहीं आ सकती .

फिर भी आशान्वित था की
कोई तो इन सुखी पत्तियों को भी
सहेज कर रखना चाहेगा .
जैसे पीपल के कोमल पत्तियों के साथ होता है .
मैं भी था कोमल ,हरा फड़फड़ाता था
इधर -उधर की हवाओं से
पर अब पलटता भी हूँ
तो सिर्फ उन गरम हवाओ से
जिससे सभी प्राणी जगत झुलस जाते हैं
शायद मैं भी एक दिन पलटते – पलटते
टूटते हुए धुल में मिल जाऊंगा
या कोई खाक कर देगा अपने क्रोध रूपी
चूल्हों में जिसमें सिर्फ स्वार्थ है कटुता है
और चाहत है एकछत्र राज्य की .
श्रीकांत प्रसाद सिंह

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