कुमार प्रभात, पटना : एक के बाद एक विधानसभा चुनावों में जीत के रथ पर सवार मोदी सरकार आगामी लोकसभा चुनाव की ज़ोरदार तैयारी में जुटी ही थी कि अचानक यूपी और बिहार के उपचुनाव के नतीजे सामने आ गए। सामान्य रूप से तो ये सिर्फ़ पांच सीटों के उपचुनाव थे मगर इसके परिणाम पर पूरे देश की निगाहें थीं। शुरुआत बिहार के परिणाम एवं उसके आगमी लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में होने वाले असर से करते हैं। बिहार में एक लोकसभा और दो विधानसभा के उपचुनाव में राजद महागठबंधन ने दो सीटों पर बाजी मारी वहीं भाजपा गठबंधन के खाते में एक सीटें आई। राजद जहां अपने जनाधार में वृद्धि एवं राजनीति में तेजी से तेज़ी से उभर रहे नेता तेजस्वी यादव की बड़ी कामयाबी के रूप में देख रही है वहीं भाजपा जदयू गठबंधन को ये नतीज़े हज़म नही हो रहे हैं। ये तीनों सीटें निधन के कारण खाली हुई थी और वहां उन्हीं के पुत्र और पत्नी ने दावेदारी की और जीत गए। तो क्या ये जीत सिर्फ सहानुभूति का परिणाम है? शायद नहीं क्योंकि नितीश कुमार ने राजद से जिस समय नाता तोड़ा तो दलील दी कि राजद राज्य में अव्यवस्था फैला रही है कानून व्यवस्था की स्थिति को ठीक करने में सहयोग नहीं कर रही।और लालू प्रसाद का पूरा परिवार भ्रष्टाचार में लिप्त है और ऐसे में भाजपा के सहयोग से डबल इंजन से विकास करने वाली सरकार बनेगी।

तो क्या ये डबल इंजन की सरकार से भी लोगों को निराशा हाथ लगी है। क्या सामाजिक मुद्दों को आशा अनुरूप सफलता नहीं मिली। क्या शराबबंदी और दहेज़ बन्दी का असर कमजोर हुआ या फिर विकास के मुद्दों को द्वितीय श्रेणी में रखना लोगों के मन को नहीं भा रहा है। सोचना पड़ेगा। राजद के लिए तो 2015 के चुनाव से ही परिस्थितियां अनुकूल होती रही है। नीतीश कुमार के समर्थन और महागठबंधन की जीत के साथ लालू अपने बेटों को सही जगह पर पहुँचाने में सफल रहे है। और अब इस छोटी सी जीत तेजस्वी और पार्टी को एक नया हौसला दे दिया है। यूपी में जैसी आंधी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए जीत आई थी। आज के दो सीटों के नतीजे हार की आँधी से कम नहीं है। वर्तमान मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की सीटों का हारना स्पष्ट रूप से योगी और मोदी लहर के विरुद्ध संकेत करता है। लोकसभा की सीटों के इन परिणामों ने बीजेपी के विकास दावों की पोल खोलकर रख दी है। और सिर्फ़ विकास ही नहीं, होंगे रोजगार ही रोजगार, नहीं रहेगा भ्रष्टाचार, मंदिर का होगा बेड़ापार और हिंदुत्व की मचेगी ललकार लेकिन शायद ये हो गए सब में लाचार। और तभी तो यूपी की जनता वादों और चिकनी चुपड़ी बातों के मोहजाल में नहीं आई।उसे लगा कि इन चार सालों में अपेक्षित परिणाम नहीं आये। तो अब मोदी सरकार के लिए समय आ गया है जब एक बार फिर अच्छे दिन आने वाले है के दावों को हकीकत में बदलने के लिए कमर कस लें और गरीब जनता और बेरोजगारों के दुःखों के सामाधान के लिए जी जान से लग जाएं।

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