पटना:
वर्ष 2013 में बिहार की सियासत ने पूरे देश को न सिर्फ चकित किया बल्कि गठबंधन के नयी संभावनाओं को भी जन्म दे दिया। 16 जून को जदयू ने भाजपा से अलग होने का निर्णय लिया। इसके बाद बिहार के साथ-साथ देश की सियासत बहुत तेजी से बदल रहा है। साल के आखिरी दिनों में सियासी समीकरणों का बदलाव क्रिकेट के प्रत्येक ओवर की तरह हो रहा है। ऊंट किस ओर करवट लेगा, इसका अंदाजा लगाने में सियासी पंड़ितों के पसीने छूट रहे हैं। हर दिन दोस्त दुश्मन दिखाई दे रहे हैं और दुश्मन दोस्त। सियासत के इस रोमांच का स्क्रिप्ट 16 जून को तैयार हुआ , जब जदयू ने भाजपा से अपने 17 वर्ष पुराना रिश्ता तोड़ लिया। सियासत की एक तलाक ने सभी पड़ोसियों के घरों में हलचल पैदा कर दी। इसका पहला नजारा बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार के विश्वासमत प्रस्ताव के दौरान देखने को मिला। जब एक-दूसरे की तारीफ करते नहीं थकने वाले भाजपा-जदयू के नेता शब्दों से वार का कोई मौका हाथ से छोड़ने को तैयार नहीं थे। विपक्षी दल भाजपा-जदयू के टकराव का पूरा आनंद लेने के लिए विधानसभा पहुंचे थे। लेकिन, जब विधानसभा से बाहर निकले तो उनका भी घर पूरी तरह बिखर चुका था। राजद-लोजपा और कांग्रेस गठबंधन तीन टुकड़ों में बंट गया। कांग्रेस ने सरकार का समर्थन किया। राजद ने सरकार का विरोध और लोजपा वाक-आउट कर गई। वाम एकता को भी करारा झटका लगा। सरकार के विरोध में वाम गठबंधन की कवायद भी पूरी तरह ध्वस्त हो गई। माकपा ने सरकार का समर्थन कर दिया। विधानसभा में जिस नया सियासत का मंच तैयार हुआ, वह अब तक जारी है। इसी के इर्द-गिर्द गठबंधन की लकीरे खीची जा रही हैं। परन्तु इन लकीरों से बेपरवाह भाजपा एक अलग लाइन खींचती दिख रही है। करीब आठ साल के बाद बिहार को एक मजबूत विपक्ष मिला। भाजपा ने अपने आक्रमक तेवर से सरकार को हर मुद्दें पर घेरने की भरपूर कोशिश की। इससे भाजपा और जदयू में तल्खी बढ़ती चली गई। वार-पलटवार का दौर चलता रहा। इसी क्रम में पिछड़ेपन की मानक तय करने के लिए बनी रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट आयी। जिससे बिहार को विशेष दर्जा मिलने की उम्मीद बढ़ी। इसके साथ ही जदयू और
कांग्रेस की नजदीकियों की भी चर्चा होने लगी। यह गठबंधन मुकाम पर पहुंचता, उससे पहले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद को चारा घोटाला के एक मामले में एक साल की सजा हो गई। इससे सियासत का कोण बदल गया। भाजपा यादव वोट तथा जदयू अल्पसंख्यक वोटों को अपने पाले में लाने में लग गई। राजद अपने कोर वोटों को सहजने में लग गया। लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने राजद की कमान संभाल ली। वामपंथी दलों ने भी अपना कार्यक्रम जारी रखा। इसी बीच भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की पटना में हुंकार रैली हुई। रैली में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने भाजपा को नीतीश सरकार की आलोचना का एक और मौका मिला। इस रैली में अपने संबोधन में मोदी ने इस धमाके की कोई चर्चा तो नहीं की, पर बिहार की ऐतिहासिक व भौगोलिक पृष्ठभूमि को दशार्ते हुए भाजपा से नाता तोडने वाले नीतीश को अवसरवादी और उनपर कांग्रेस संग आंख-मिचौनी करने का आरोप लगाया। नीतीश कुमार ने भी नरेन्द्र मोदी पर पलटवार करने में देर नहीं की। 29 अक्टूबर को नालंदा जिला के राजगीर में आयोजित भाजपा के चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार ने मोदी की हिटलर से तुलना की और बिहार के इतिहास के प्रति उनका अज्ञान भी बताया। नीतीश ने चुटकी लेकर कहा था कि लालकिला पर राष्ट्रध्वज फहराने का सपना, सपना ही रह जाएगा। इस दौरान बिहार का सियासत पूरी तरह भाजपा और जदयू पर केन्द्रित हो गया। लेकिन इस साल के अंत होने और सियासत क्लाइमेक्स में वक्त बाकी था। राजद सुप्रीमो जेल से बाहर निकले। उनके आते ही सारे समीकरण बदल गये। कांग्रेस और जदयू के बीच दूरी बढ़ गई। राजद और कांग्रेस के तालमेल पर मुहर लगनी बाकी थी कि लोजपा ने बगावती तेवर अख्तियार कर लिया। सियासी पंडितों ने लोजपा और जदयू के बीच संभावनाओं से इनकार नहीं किया। परन्तु भाकपा माले ने कांग्रेस के साथ राजद के समझौते पर एतराज जताकर फिर से वाम एकता को हवा देने में लग गये है। वहीं भाजपा गठबंधन को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं है। भाजपा और उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के बीच तालमेल की बात कुछ दिन सुर्खिया बनी थी। लेकिन यह तालमेल भी आगे बढ़ता दिखाई नहीं दे रहा है। साल के आखिरी दस दिनों में जिस प्रकार से राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है। उससे तो यही अंदाजा लगाया जा रहा है कि अगले साल भी कुछ बड़ा सियासी धमाका हो सकता है। वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव होने वाले है। चुनाव के पहले या बाद में कौन दोस्त बनता है और कौन दुश्मन यह तो नेपथ्य में है। लेकिन इतना जरूर है कि वर्ष 2013 की तरह ही वर्ष 2014 में बिहार से कोई बड़ा सियासी खबर देश को मिलेगी।

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